Wednesday, 17 August 2016

चतुर्थ दिवस की कथा

चतुर्थ दिवस की कथा 
रामदेव भवन साहूकारपेट में दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक आयोजित होने वाली संगीतमय श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन सत्संग और सन्त के संग के महत्व को बताया गया। कथावाचक प.किशोरचंद्र जी  ने बताया कि सत्संग के बिना मनुष्य ज्ञान नहीं मिलता है,वही सत्संग के बिना जीवन भी अधूरा है।
कार्येकर्म की शुरुवात रामस्वरूप वैष्णव ने सुंदर भजनों से की ।
आज की कथा महान भक्तों से संपुरित है, कथा का प्रारंभ भक्त प्रवर ध्रुव से है तो विश्राम भक्त प्रवर प्रहलाद की कथा से।
आज व्यास पूजन भगवती प्रसाद शर्मा जी ने किया,
कथा में आज शास्त्री जी के मुख से भक्त ध्रुव की कथा सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गये। जड़ भरत की कथा भी विस्तार से सुनाई। अजामिल का उपाख्यान सुना कर बताया कि साधुओं के कहने से अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा। अन्त समय में अपने पुत्र नारायण को आवाज दी। इसी से उसका उद्धार हो गया। पुरंजन उपाख्यान,जड़भरत , वामन अवतार, उन्होंने अन्य प्रसंग में कहा कि धन के साथ दोष भी आते है इसलिए धन का दशांश दीं-दुखियों की सेवा , गौ सेवा में खर्च करें.आप सद्कर्म करे और आचरण अच्छे रखे तो आपको यही स्वर्ग की अनुभूति होगी. साथ ही कहा कि भगवान् भाव का भूखा है उन्हें मित्र के भाव या शत्रु के भाव जैसा स्मरण करोगें वैसे फल की प्राप्ति होगी.अच्छा पाने के लिए मन में सदा अच्छे भाव का संचार बनाये रखे |
    हिरण्यकश्यप-प्रहलाद के प्रसंग सुनाते हुए वर्तमान जीवन से जोड़ने का प्रयास किया |प्रहलाद के वृतांत को सुनाते हुए कहा कि भक्ति में ही शक्ति है,भक्ति के बिना मनुष्य ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं कर सकता है।नृसिंह अवतार प्रसंग की विवेचना करते हुए व्यक्त किए।नृसिंह अवतार की कथा सुनकर श्रोता भावविभोर हो गए। कथाव्यास के मुख से भक्त प्रहलाद एवं भगवान नृसिंह अवतार की कथा बहुत ही भक्ति भाव एवं रोचकता पूर्ण कही गई।
महाराज के श्रीमुख से गजेन्द्र मोक्ष, समुद्र मंथन एवं वामन अवतार की कथाओं का श्रवणपान वहां मौजूद भक्तगणों को कराया।
हमेशा सूर्यउदय से पहले जागना चाहिए।दसो इंद्रियों को संयमित रखना चाहिए।नियमित भगवन नाम का जप करना चाहिए। जहां भगवान के नाम नियमित रूप से लिया जाता है। वहां सुख, समृद्धि व शांति बनी रहती है। जिस जिव को ईश्वर की सत्ता का ज्ञान होगा उसको अहँकार नही होगा।भगवान प्रेम (भक्ति) से मिलते है।प्रेम में नियम नही होता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की कृपा की अनुभूति सदैव करनी चाहिए क्योंकि वे कृपा के सागर हैं। सभी पर अपनी कृपा करते हैं। जिसका जैसा पात्र होगा, अर्थात भाव होगा उसे वैसा ही मिलता है। सबसे पहले हमें अपना भाव शुद्ध करने की जरूरत है। भाव के वसमे है भगवान।छल ओर छलावा ज्यादा दिन नहीं चलता।छलछिद्र जब जीवन में आ जाए तो भगवान भी उसे ग्रहण नहीं करते है- निर्मल मन प्रभु स्वीकार्य है। छलछिद्र रहित ओर निर्मल मन भक्ति के लिए जरूरी है। गाय की सेवा घर घर में होनी चाहिए ।सतकर्म कभी निष्फल नही जाता।
कथा व्यास ने अपने मधुर कंठ से संगीत की मधुर स्वर लहरियों पर अनेकों भजन सुनाकर श्रद्धालुओं को झूमने एवं नृत्य करने को विवश कर दिया। अन्त में आरती के पश्चात प्रसाद वितरण कराया गया। हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति ने सभी भक्तों को अधिक संख्या में उपस्थिति होने हेतु आहवान किया।

No comments:

Post a Comment