Wednesday, 17 August 2016

समाचार पत्रों में कथा

सप्तम दिवस की कथा

सप्तम दिवस की कथा

रामदेव भवन में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के सप्तम दिवस शनिवार की कथा को प्रारंभ करते हुए कथा वाचक प.किशोरचंद्र शास्त्री महाराज ने कहा
रास लीला के समय गोपियों को मान हो जाता है । भगवान् उनका मान भंग करने के लिए अंतर्धान हो जाते हैं । उन्हें न पाकर गोपियाँ व्याकुल हो जाती हैं । वे आर्त्त स्वर में श्रीकृष्ण को पुकारती हैं, यही विरहगान गोपी गीत है । इसमें प्रेम के अश्रु,मिलन की प्यास, दर्शन की उत्कंठा और स्मृतियों का रूदन है । भगवद प्रेम सम्बन्ध में गोपियों का प्रेम सबसे निर्मल,सर्वोच्च और अतुलनीय माना गया है। भगवान श्री कृष्ण के बचपन की लीलाओं को याद कर नंद बाबा एवं यशोदा आदि सभी ब्रजवासियों के भाव भरे संवाद को कथा में सुनाया गया। कंस वध,उद्धव गोपी संवाद, आदि प्रसंग विस्तार से बताये।भक्ति रस में डूबे श्रद्धालुओं ने विभिन्न प्रकार की झांकियों का राधा कृष्ण गाोपियों के संग नाच गाकर आनंद उठाया।भगवान् के 16108 विवाह का वर्णन किया और भगवान के परम मित्र सुदामा जी की कथा और कथासार का श्रवण कराते हुए कथा के सप्तम दिवस को विश्राम दिया
शास्त्री जी ने बताया कि एक बार बहुत समय के पश्चात भगवान श्री कृष्ण की भेंट ब्रज वासियों एवं मथुरावासियों से कुरू क्षेत्र में हुई वहां पर गोपियों के मिलने पर रूखमणी आदि भगवान की रानियों से उनके विवाह प्रसंग को सुनाया।
यदुवंश को लगे विप्र श्राप तथा राजा निमि एवं नौ योगेश्वरों के संवाद को सुनाया। प्रसंग में दतात्रेय जी के 24 शिक्षा गुरुओं की कथा को सुनाते हुए बताया कि जीव को शिक्षा कही से मिले ग्रहण कर लेनी चाहिए। दतात्रेय जी ने पिंगला नाम की वेश्या तक को अपना शिक्षा गुरु माना था।
भगवान श्री कृष्ण एवं बलराम जी के स्वधाम गमन की कथा को सुनाया गया। राजा परीक्षित द्वारा शुकदेव मुनि की पूजा करना एवं परीक्षित का मृत्यु के भय से मुक्त होने की कथा को सुनाते हुए बताया गया कि तक्षत सर्प के डंसने से राजा परीक्षित की मृत्यु तथा परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा सर्प यज्ञ का आयोजन करने तथा कलयुग में उत्पन्न होने वाले राजाओं के वंश तथा कलयुग में होने वाले अधर्म एवं उनसे मुक्ति के विभिन्न उपायों के बारे में बताया। कथा की विश्राम के पश्चात हवन यज्ञ किया किया गया। हवन में राधेश्याम रावोरिया ,अमित शर्मा,विकास गौड़ आदि ने आहुति डाली।इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल थे।
श्रीसुदामा चरित्र राजा परिक्षित की मुक्ति के साथ श्रीमद् भागवत कथा को पूर्ण श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ विश्राम हुआ। कथावाचक  जी ने जीवन में मित्र और मित्रता के बारे में बताते हुए श्री कृष्ण सुदामा के जीवन चरित्र के बारे में बताया।

कथा छटा दिवस

कथा छटा दिवस
हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति के तत्वाधान में श्री रामदेव भवन में पंडित किशोरचन्द्र जी शास्त्री महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के छठवे दिन के वाचन के दौरान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वृत्तांत सुनाया।आज की कथा गोपाल और गौमाता की महिमा से ओतप्रोत थी। सबसे पहले गोविंद दामोदर स्तोत्र पाठ किया।महाराज ने कहा कि शास्त्रों में भी विद्यमान है कि गौ माता में ३३ करोड़ देवी देवताओं का वास है। वर्तमान में जिस प्रकार से गौ माता का तिरस्कार हो रहा है वैसे-वैसे हमारे अंदर संस्कृति और संस्कारों का भी पतन होता जा रहा है। आज की आवाज है कि गौ माता का संरक्षण कर उसका सम्मान करो तभी हमारे संस्कारों का सुधार होगा। कृष्ण ने जन्म से सातवें दिन ही पूतना को मौत की नींद सुला दिया।हरि हर मिलन प्रसंग विस्तार से बताया।राम और कृष्ण नाम की महिमा बताई।कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नर उतरिहि पारा।
उन्होंने कहा की संताने माता-पिता को मोक्ष दिला सकती है पर संस्कारवान तैयार करने की जिम्मेदारी उन्ही की है की है। बच्चो को शास्त्रीय शिक्षा जरूर दे । आज जब दुष्कर्मों की आंधी चल रही है ऐसे में धन-नाम और वैभव कमाना आसान है पर अपनी संतान को योग्य व् संस्कारवान बनाना बहुत मुस्किल है.जिन लोगों के भाग्य में सुसंस्कारित - योग्य संताने आती है उनसे बड़ा धनवान दुनिया में कोई नहीं है ।उदाहरण देते हुए कहा की वर्तमान दौर की संताने निश्चित रूप से माता-पिता से ज्यादा बुद्धिमान हो सकते है पर उन्हें यह सीख मिलनी चाहिए कि परमात्मा यानी मंदिर,माता,पिता और गुरु के सामने अपनी योग्यता का प्रदर्शन न करे तो ही अच्छा क्योंकि इन सबो का सम्मान और  उनसे प्राप्त ज्ञान व्  उनके मातृत्व का भाव ही जीवन के सफलता की कुंजी |
उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण की बाल लीला में सबसे आकर्षित करने वाली कला थी। जिससे वे बालपन में अपने बाल सखाओं के साथ मिलकर माखन की चोरी करते और माखन चुराते पकड़े जाने पर गुजरियां यशोदा मैया को उलाहना देती थी। माखन चोरी लीला को विस्तार से सुनाया।श्री कृष्ण ने गोपियो के मन रूपी माखन को चुराया है।
चीर हरण के समय भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के अज्ञान रूपी वस्त्रों का हरण किया है। इसलिये कहा गया है कि भगवान का चरित्र मनुष्य के अज्ञान का नाश करता है, इसी के चलते जीवन में ज्ञान रूपी प्रकाश पैदा होता है।
ज्ञान और भक्ति के बिना मानव जीवन अधूरा है, उन्होंने श्रोताओं का ध्यानाकर्षित करते हुये कहा कि गौ कि सेवा सबसे बड़ी सेवा है इसकी रक्षा करना हमारा सबसे बड़ा धर्म है। भगवान श्री कृष्ण ने भी अपने सखा के संग हजारों गायों की सेवा की है।
श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव के छठे दिन कथा वाचक शास्त्री जी ने कहा कि श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा करके इंद्र का मान मर्दन किया। भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का साधन गौ सेवा है। श्रीकृष्ण ने गौ को अपना आराध्य मानते हुए पूजा एवं सेवा कर बताया कि गौ सेवक कभी निर्धन नहीं होता। शास्त्री ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लेते ही कर्म का चयन किया।  प्रभु ने बाल्यकाल में ही कालिया वध किया और सात वर्ष की आयु में गोवर्धन पर्वत को उठा कर इंद्र के अभिमान को चूर-चूर किया।गोवर्धन पूजा का वृतांत सुनाते हुये कहा कि इंद्र के अहंकार को नष्ट करने के लिये भगवान ने गोवर्धन पर्वत को सात साल की उम्र में ही ऊंगली पर उठा लिया था, भगवान ने वृज वासियों की रक्षा की।
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया ने गौमहिमा बताते हुए कहा।
धर्म,अर्थ काम और मोक्ष एंव इनसे भी आगे ईश्वरीय प्रेम को प्राप्त करने हेतु गौ सेवा सर्व सुलभ साधन है। गौमाता की महिमा अपार है। इस संसार में गौ एक अदभुत प्राणी है। जो वास्तव में सबके लिये कल्याणकारी है। अपने शास्त्रो के अनुसार गाय में तैतीस कोटि देवताओ का निवास है। केवल गौमाता के सेवा से अपने सम्पूर्ण देवी देवताओ की सेवा सम्पन हो जाती है। इसीलिए गौमाता को सर्वदेवमहि कहा जाता है। गौ के दर्शन से समस्त देवताओ के दर्शन एंव समस्त तीर्थो की यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है तथा गौ-दर्शन,गौ स्पर्श ,गौ पूजन ,गौ स्मरण एंव गोदान करने से मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार गौ भारतवासियो की परम आराध्या है। इस लिए भारत सरकार से हमारा निवेदन है कि गौमाता को राष्ट्र माता घोषित करे। प्राचीन काल सभी गौ-सेवापरायण थे,और गाये भी बहुत अधिक थी,जिससे हमारे देश में अन्न -धन  ,सुख शांति एंव समृद्धि थी।  बड़े बुजुर्ग कहते है देश में दूध दही की नदियां बहती थी।
वर्तमान समय में दुर्भाग्यवश आधुनिक सभ्यता की चक्काचोंद में भारतीय गौवंश की भारी उपेक्षा हो रही है एंव गौ-हत्याये हो रही है और गायों के संख्या भी बहुत कम हो गयी।
परिणामत:देश में दुःख दारिद्रय का विस्तार हो रहा है,और लोगो में हिंसा,क्रोध लोभ एंव विलासिता बढ़ती जा रही है।
गोवत्स ने कहा आज के परिवेश में गौवंश के प्रति-धार्मिक एंव आध्यात्मिक चिंतन के साथ-साथ आर्थिक,सामाजिक तथा विज्ञानिक एंव स्वास्थ्य संबंधी चिंतन की आवश्यकता है।
आज व्यास पूजन अमित शर्मा जी ने किया।

पंचम दिवस की कथा

पंचम दिवस की कथा
रामदेव भवन साहुकारपेट प्रांगण में चल रही सप्त दिवसीय भागवत कथा के पांचवें दिन कथा व्यास पं किशोरचंद्र शास्त्री जी महाराज ने श्रीराम जन्मोत्सव मनाया। उत्‍तरी भारत में सरयू नदी के तट पर बसी अयोध्‍या,जहॉं त्रेता युग में दशरथ के पुत्र राम का जन्‍म हुआ था। अयोध्‍या, अर्थात् जहॉं कभी युद्ध नहीं होता। एक दिन विश्‍वामित्र आए और अपने आश्रम के संरक्षण हेतु दो राजकुमार - राम और लक्ष्‍मण - मॉंगे। विश्‍वामित्र और दशरथ के गुरू वसिष्‍ठ का पुराना मनमुटाव प्रसिद्ध है। कहते हैं, विश्‍वामित्र क्षत्रिय कुल में उत्‍पन्‍न हुए थे और वसिष्‍ठ उन्‍हें ‘राजर्षि’ कहते थे। विश्‍वामित्र की इच्‍छा ‘ब्रम्‍हर्षि’ कहाने की थी। अंत में विश्‍वामित्र क्रोध पर विजय प्राप्‍त कर सचमुच में ब्रम्‍हर्षि बने। पर जब विश्‍वामित्र ने इन बालकों की जोड़ी को अपने आश्रम की रक्षा के लिए मॉंगा तो वसिष्‍ठ ने सहर्ष आज्ञा दिलवा दी। मानवता का और समाज का कार्य राम के द्वारा संपन्‍न होना था।अहिल्या उधार, सीता स्वयंवर,वनवास,खेवट का प्रसंग,सूर्पनखा के नाक कान काटना आदि प्रसंग विस्तार से बताये।
महाराज का कहना है कि श्रीराम कथा कलयुग में कामधेनु के समान है। कलिकाल में राम नाम स्मरण एवं भागवत कथा श्रवण मात्र से ही जीव कष्टों से छुटकारा पा सकता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस के रूप में अमृत प्रदान किया है। आज के विसंगतिपूर्ण वातावरण में अगर श्रीराम के आर्दश को अपना लिया जाए तो मानस का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। शास्त्री कहते हैं कि मानस में रामकथा में मर्यादा है। उन्होंने कहा कि विश्वास से कथा उतारने से कथा जीवन का सुधार कर देती है। श्रीराम कथा जीव के जन्म-जन्मांतर की व्यथा हर लेती है। रामकथा सुनने से जीव का संशय समाप्त हो जाता है और दुख दूर हो जाते हैं।उन्होंने कहा कि श्रीराम के चरित्र को सुनने मात्र से मन शांत हो जाता है और आनन्द मिलता है। व्यक्ति के तीनों तापों और छहों विकारों से उत्पन्न दुखों का रामनाम नाश कर देता है। जिन्होंने रामकथा नहीं सुनी उनके कान साँप के बिल के समान हैं और यदि व्यक्ति में रामभक्ति नहीं आई तो ऐसे लोगों की छाती बज्र के समान है, जिन्होंने राम-नाम-जप को अपनी जीभ में नहीं उतारा ऐसे लोगों की जीभ मेंढक और चमगादड़ के समान है। व्यास जी ने राम कथा के प्रसंग सुनाते हुए वर्तमान जीवन से जोड़ने का प्रयास किया |
आज श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की बड़ी ही मनोरम कथा का बखान किया गया। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में सराबोर श्रृद्धालु जन्मोत्सव पर जमकर नाचे और उपहारों की वर्षा की। श्रीमद् भागवत कथा सुनाते हुये शास्त्री ने कहा कि द्वापर युग में एक कंस के अत्याचार से समूची पृथ्वी थर्रा उठी थी। कंस का वध कर समाज को अत्याचार से मुक्त कराने और राष्ट्र को संपन्न बनाने के निमित्त से भगवान ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। किंतु आज समाज में फैले भ्रष्टाचार, अराजकता, दहेज, हिंसा रूपी कंस मुंह बाये खड़ा है। जिन्होंने पूरे देश को अपने चपेट में ले रखा है। इन तमाम कंसों से निपटने के लिए अब एक कृष्ण से काम नहीं चलने वाला है। आवश्यकता है कि हर घर में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण अवतरित हों। उनके नैतिक मूल्यों की स्थापना की, ताकि शान्ति के पथ पर चलकर जगतगुरू के पद पर फिर से हमारा राष्ट्र आसीन हो जायेगा। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण व मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जन्म सच्चे अर्थों में मानवता की स्थापना के लिए हुआ था। प्रसंग सुन श्रोता मंत्रमुग्ध होकर झूम उठे। भगवान को सिर पर टोकरी में लेकर जब भक्त प्रवचन स्थल में पहुंचे तो पूरा पंडाल जय कन्हैयालाल की आवाज से वृन्दावन में तब्दील हो गया। कथा में श्रीकृष्ण जन्म का प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा की भगवान कभी जन्म नहीं लेते, अवतार धारण करते हैं, प्रगट होते हैं। प्रगट वही होता है जो पहले से विद्यमान हो और भगवान तो कण-कण में मौजूद रहते हैं। इसलिए उनका जनम नहीं होता। आगे उन्होंने कहा कि वासुदेव देवकी ने अपनी सात संतानों को अपनी आखों के सम्मुख काल के गाल में जाते देखा था और कंस का अहंकार रूपी घड़ा पूरा भर चुका था। इसलिए भगवान को जेल में प्रगट होना पड़ा। पुष्पों की होली खेलते हुए भक्तों द्वारा जन्म उत्सव मनाया गया। प्रसंग से पहले उन्होंने देवकी-वासुदेव प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया
  राम जन्म प्रसंग के साथ श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग सुनाएं।
यह जानकारी हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति के कार्यकर्ता मेवादास वैष्णव एंव मिठुदास वैष्णव ने दी।

चतुर्थ दिवस की कथा

चतुर्थ दिवस की कथा 
रामदेव भवन साहूकारपेट में दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक आयोजित होने वाली संगीतमय श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन सत्संग और सन्त के संग के महत्व को बताया गया। कथावाचक प.किशोरचंद्र जी  ने बताया कि सत्संग के बिना मनुष्य ज्ञान नहीं मिलता है,वही सत्संग के बिना जीवन भी अधूरा है।
कार्येकर्म की शुरुवात रामस्वरूप वैष्णव ने सुंदर भजनों से की ।
आज की कथा महान भक्तों से संपुरित है, कथा का प्रारंभ भक्त प्रवर ध्रुव से है तो विश्राम भक्त प्रवर प्रहलाद की कथा से।
आज व्यास पूजन भगवती प्रसाद शर्मा जी ने किया,
कथा में आज शास्त्री जी के मुख से भक्त ध्रुव की कथा सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गये। जड़ भरत की कथा भी विस्तार से सुनाई। अजामिल का उपाख्यान सुना कर बताया कि साधुओं के कहने से अजामिल ने अपने पुत्र का नाम नारायण रखा। अन्त समय में अपने पुत्र नारायण को आवाज दी। इसी से उसका उद्धार हो गया। पुरंजन उपाख्यान,जड़भरत , वामन अवतार, उन्होंने अन्य प्रसंग में कहा कि धन के साथ दोष भी आते है इसलिए धन का दशांश दीं-दुखियों की सेवा , गौ सेवा में खर्च करें.आप सद्कर्म करे और आचरण अच्छे रखे तो आपको यही स्वर्ग की अनुभूति होगी. साथ ही कहा कि भगवान् भाव का भूखा है उन्हें मित्र के भाव या शत्रु के भाव जैसा स्मरण करोगें वैसे फल की प्राप्ति होगी.अच्छा पाने के लिए मन में सदा अच्छे भाव का संचार बनाये रखे |
    हिरण्यकश्यप-प्रहलाद के प्रसंग सुनाते हुए वर्तमान जीवन से जोड़ने का प्रयास किया |प्रहलाद के वृतांत को सुनाते हुए कहा कि भक्ति में ही शक्ति है,भक्ति के बिना मनुष्य ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त नहीं कर सकता है।नृसिंह अवतार प्रसंग की विवेचना करते हुए व्यक्त किए।नृसिंह अवतार की कथा सुनकर श्रोता भावविभोर हो गए। कथाव्यास के मुख से भक्त प्रहलाद एवं भगवान नृसिंह अवतार की कथा बहुत ही भक्ति भाव एवं रोचकता पूर्ण कही गई।
महाराज के श्रीमुख से गजेन्द्र मोक्ष, समुद्र मंथन एवं वामन अवतार की कथाओं का श्रवणपान वहां मौजूद भक्तगणों को कराया।
हमेशा सूर्यउदय से पहले जागना चाहिए।दसो इंद्रियों को संयमित रखना चाहिए।नियमित भगवन नाम का जप करना चाहिए। जहां भगवान के नाम नियमित रूप से लिया जाता है। वहां सुख, समृद्धि व शांति बनी रहती है। जिस जिव को ईश्वर की सत्ता का ज्ञान होगा उसको अहँकार नही होगा।भगवान प्रेम (भक्ति) से मिलते है।प्रेम में नियम नही होता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की कृपा की अनुभूति सदैव करनी चाहिए क्योंकि वे कृपा के सागर हैं। सभी पर अपनी कृपा करते हैं। जिसका जैसा पात्र होगा, अर्थात भाव होगा उसे वैसा ही मिलता है। सबसे पहले हमें अपना भाव शुद्ध करने की जरूरत है। भाव के वसमे है भगवान।छल ओर छलावा ज्यादा दिन नहीं चलता।छलछिद्र जब जीवन में आ जाए तो भगवान भी उसे ग्रहण नहीं करते है- निर्मल मन प्रभु स्वीकार्य है। छलछिद्र रहित ओर निर्मल मन भक्ति के लिए जरूरी है। गाय की सेवा घर घर में होनी चाहिए ।सतकर्म कभी निष्फल नही जाता।
कथा व्यास ने अपने मधुर कंठ से संगीत की मधुर स्वर लहरियों पर अनेकों भजन सुनाकर श्रद्धालुओं को झूमने एवं नृत्य करने को विवश कर दिया। अन्त में आरती के पश्चात प्रसाद वितरण कराया गया। हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति ने सभी भक्तों को अधिक संख्या में उपस्थिति होने हेतु आहवान किया।

तीसरे दिवस की कथा

रामदेव भवन साहूकारपेट में दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक आयोजित होने वाली संगीतमय श्रीमद भागवत कथा के तीसरे दिन सत्संग और सन्त के संग के महत्व को बताया गया। कथावाचक प.किशोरचंद्र जी  ने बताया कि सत्संग के बिना मनुष्य ज्ञान नहीं मिलता है,वही सत्संग के बिना जीवन भी अधूरा है।
कार्येकर्म की शुरुवात रामस्वरूप वैष्णव ने सुंदर भजनों से की ।इसके बाद मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहितों द्वारा कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत की। आज व्यास पूजन मेवादासजी वैष्णव ने किया,
आज शास्त्री जी के श्रीमुख से बाराह अवतार, भगवान ने बाराह अवतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी व वेद को वापस लाये। उन्होंने कपिल अवतार की कथा सुनाई। कपिल अवतार की कथा सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर दिया। शिव जी के द्वारा दक्ष का यज्ञ विध्वंस किया गया। दक्ष यज्ञ की सम्पूर्ण कथा विस्तार से सुनाई। आज की कथा में जन सैलाब उमड़ पड़ा।
हमेशा सूर्यउदय से पहले जागना चाहिए।दसो इंद्रियों को संयमित रखना चाहिए।नियमित भगवन नाम का जप करना चाहिए। जहां भगवान के नाम नियमित रूप से लिया जाता है। वहां सुख, समृद्धि व शांति बनी रहती है। जिस जिव को ईश्वर की सत्ता का ज्ञान होगा उसको अहँकार नही होगा।भगवान प्रेम (भक्ति) से मिलते है।प्रेम में नियम नही होता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की कृपा की अनुभूति सदैव करनी चाहिए क्योंकि वे कृपा के सागर हैं। सभी पर अपनी कृपा करते हैं। जिसका जैसा पात्र होगा, अर्थात भाव होगा उसे वैसा ही मिलता है। सबसे पहले हमें अपना भाव शुद्ध करने की जरूरत है। भाव के वसमे है भगवान।छल ओर छलावा ज्यादा दिन नहीं चलता।छलछिद्र जब जीवन में आ जाए तो भगवान भी उसे ग्रहण नहीं करते है- निर्मल मन प्रभु स्वीकार्य है। छलछिद्र रहित ओर निर्मल मन भक्ति के लिए जरूरी है। गाय की सेवा घर घर में होनी चाहिए।
कथा के बीच में व्यास जी के संगीतमय भजन से श्रद्धालु श्रोता भाव विभोर हो रहे थे।
शास्री महाराज ने भागवत कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि राजा उत्तानपाद एक जीव है इस जीव की दो पत्निया सुरूचि एवं सुनीति । एक भक्ति का मार्ग बताती है दुसरा उससे विमुख करती है। उन्होंने कहा कि सतसंग का जो फल है वही ध्रुव कहलाता है। ध्रुव अटल है ध्रुव विश्वास है। वही सुनीति का जो पुत्र था वह अंधकार की ओर ले जाना चाहता था उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति में उम्र की कोई सीमा नही होती। जीवन में कोई विशेष संयोग आता है, तभी व्यक्ति भगवान की ओर प्रवृत्त होता है। ऐेसे ही एक पांच वर्ष के बालक के साथ हुआ।उस बालक का नाम था ध्रुव, धु्रव भगवान की प्राप्ति के लिये वन की ओर चला गया जहां देवऋषि नारद जी मिले जिससे मंत्र की दिक्षा लेकर भगवान को प्राप्त किया।
उन्होंने बताया कि कर्म के अनुसार मनुष्य जन्म मिलता है तब जन्म से मृत्यु तक जीव सुख की तलाश में रहता है उसे वह सुख केवल भगवत प्रेम से ही प्राप्त होता है। जीवन को कर्मशील बनाना है तो श्रीमदभागवत कथा का श्रवण करें। यह जीवन जीने की कला सीखाती है। मन ही बन्धन और मुक्ति का कारण है। आहार (खान पान) को शुद्ध करने से मन शुद्ध होता है।भगवान का चिन्तन करना चाहिए।
कथा व्यास ने अपने मधुर कंठ से संगीत की मधुर स्वर लहरियों पर अनेकों भजन सुनाकर श्रद्धालुओं को झूमने एवं नृत्य करने को विवश कर दिया। अन्त में आरती के पश्चात प्रसाद वितरण कराया गया। हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति ने सभी भक्तों को अधिक संख्या में उपस्थिति होने हेतु आहवान किया।
कथा की व्यवस्था में समिति के सन्दीप राजपुरोहित,पंडित दामोदर प्रसाद विकास गौड़,मनोहर वैष्णव,राधेश्याम रावोरिया ,भगवती प्रसाद,मिठुदास वैष्णव,मेवादास वैष्णव  अमित शर्मा,मोहनलाल सीरवी आदि सेंकडो श्रोता उपस्थित थे।

दूसरे दिवस की कथा

चेन्नई,हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति के तत्वाधान में श्री रामदेव भवन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन सोमवार को पंडित किशोरचन्द्र शास्त्री जी महाराज प्रवचन देते हुए कहा ।श्रीमद्भागवत कल्पवृक्ष की ही तरह है, यह हमें सत्य से परिचय कराता है। उन्होंने कहा कि कलयुग में तो श्रीमद् भागवत कथा की अत्यंत आवश्यकता है, क्योंकि मृत्यु जैसे सत्य से हमें यही अवगत कराता है। सत्य ही धर्म है। कल्ह जहाँ पर होगी वहाँ लक्ष्मी नही रूकती है।गाय के बिना गोविन्द अधूरा है।आत्म ज्ञान और विवेक मनुष्ये के मित्र है।गर्भ हत्या से बड़ा कोई पाप नही।दूसरे दिन की कथा के प्रारम्भ शास्त्री जी महाराज ने प्रेमाभाव का विस्तार से वर्णन कर समझाया | कलयुग में भगवान का केवल मात्र सुमिरन करने से ही भवसागर को पार किया जा सकता है।
शास्त्री जी महाराज ने कथा के दूसरे दिन शुकदेव जी महाराज का जन्म कथा का सारगर्भित वृतांत सुनाया।
शुकदेव के जन्म के बारे में यह कहा कि ये महर्षि वेद व्यास के पुत्र थे और वह बारह वर्ष तक माता के गर्भ में रहे। कथा कुछ इस प्रकार है। भगवान शिव, पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। पार्वती जी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गयी और उनकी जगह पर वहां बैठे एक शुक ने हुंकारी भरना प्रारम्भ कर दिया। जब भगवान शिव को यह बात ज्ञात हुई, तब उन्होंने शुक को मारने के लिये दौड़े और उसके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुक जान बचाने के लिए भागता रहा, भागते-भागते वह व्यास जी के आश्रम में आया और सूक्ष्मरूप बनाकर उनकी पत्नी के मुख में घुस गया। वह उनके गर्भ में रह गया। ऐसा कहा जाता है कि ये बारह वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाये। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था।
   जन्म लेते ही ये बाल्य अवस्था में ही तप हेतु वन की ओर भागे, ऐसी उनकी संसार से विरक्त भावनाएं थी। परंतु वात्सल्य भाव से रोते हुए श्री व्यास जी भी उनके पीछे भागे। मार्ग में एक जलाशय में कुछ कन्याएं स्नान कर रही थीं, उन्होंने जब शुकदेव जी महाराज को देखा तो अपनी अवस्था का ध्यान न रख कर शुकदेव जी का आशीर्वाद लिया। लेकिन जब शुकदेव के पीछे मोह में पड़े श्री व्यास वहां पहुंचे तो सारी कन्याएं छुप गयीं। ऐसी सांसारिक विरक्ति से शुकदेव जी महाराज ने तप प्रारम्भ किया।
शास्त्रीजी ने कथा के दूसरे दिन महाभारत काल में भगवान की लीलाओं के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि जो आपसे दुश्मनी रखता है उससे प्रेम कीजिए, वह अपने आप दुश्मनी भूल जाएगा। उन्होनें बताया कि वर्तमान समय में हमें संस्कारविहीन करने का कुचक्र चलाया जा रहा है। जिसके कारण मानव पथभ्रष्ट होता जा रहा है। मगर संतों के बताए मार्ग का अनुसरण कर एवं भगवन् नाम के सुमिरन से समूचे विश्व का कल्याण संभव है।
कथा में परीक्षित जन्म का सविस्तार से वर्णन किया।शास्त्री जी ने राजा परीक्षित के सन्दर्भ और कलयुग के आगमन की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित बहुत ही धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में कभी भी प्रजा को किसी भी चीज की कमी नहीं थी।
एक बार राजा परीक्षित आखेट के लिए गए, वहाँ उन्हें कलयुग मिल गया। कलयुग ने उनसे राज्य में आश्रय माँगा, लेकिन उन्होंने देने से इनकार कर दिया। बहुत आग्रह करने पर राजा ने कलयुग को तीन स्थानों पर रहने की छूट दी। इसमें से पहला वह स्थान है जहाँ जुआ खेला जाता हो, दूसरा वह स्थान है जहाँ पराई स्त्रियों पर नजर डाली जाती हो और तीसरा वह स्थान है जहाँ झूठ बोला जाता हो। लेकिन राजा परीक्षित के राज्य में ये तीनों स्थान कहीं भी नहीं थे। 
तब कलयुग ने राजा से सोने में रहने के लिए जगह माँगी। जैसे ही राजा ने सोने में रहने की अनुमति दी, वे राजा के स्वर्णमुकुट में जाकर बैठ गए। राजा के सोने के मुकुट में जैसे ही कलयुग ने स्थान ग्रहण किया, वैसे ही उनकी मति भ्रष्ट हो गई। कलयुग के प्रवेश करते ही धर्म केवल एक ही पैर पर चलने लगा। लोगों ने सत्य बोलना बंद कर दिया, तपस्या और दया करना छोड़ दिया। अब धर्म केवल दान रूपी पैर पर टिका हुआ है।
यही कारण है कि आखेट से लौटते समय राजा परीक्षित श्रृंगी ऋषि के आश्रम पहुँच कर पानी की माँग करते हैं। उस समय श्रृंगी ऋषि ध्यान में लीन थे। उन्होंने राजा की बात नहीं सुनी, इतने में राजा को गुस्सा आ गया और उन्होंने ऋषि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया। जैसे ही उनके पुत्र को मालूम चलो तो उन्होंने राजा परीक्षित को सर्पदंश से मृत्यु का श्राप दे दिया।
शास्त्री ने कहा कि हम सब कलयुग के राजा परीक्षित हैं, हम सभी को कालरूपी सर्प एक दिन डस लेगा, राजा परीक्षित श्राप मिलते ही मरने की तैयारी करने लगते हैं।  मृत्यु ही इस संसार का एकमात्र सत्य है। श्रीमद् भागवत की कथा हमें इसी सत्य से अवगत कराया जाता है।
एंव उतरा और भगवान श्री कृष्ण का संवाद एंव कुन्ती और भगवान कृष्ण का संवाद। भगवान को भूलना ही विपति है।भगवान की याद ही सम्पति है।
भागवत कथा श्रवण करने से मन को शांति मिलती है और पापों से छुटकारा मिलता है।
उन्होनें श्रीमद्भागवत महापुराण पर प्रवचन के दौरान सत्संग की महिमा का बखान करते हुए कहा कि दुनिया भर में आज अराजकता का माहौल बन रहा है। मगर इसके बावजूद सत्संग के कारण यह पृथ्वी मौजूद है। अन्यथा कब का प्रलय हो जाता। उन्होनें कहा कि जब-जब भी धरती पर पाप और अत्याचार बढ़े है। तब भगवान ने स्वयं विविध रूपों में अवतार लेकर पापियों-अत्याचारियों का संहार कर अपने भक्तों को भयमुक्त किया है।
व्यास पूजन गोवत्स पदमाराम राधेश्याम रावोरिया जी ने किया। कथा श्रवण करने के लिए सैंकड़ों श्रोता पधारे।  कथा के साथ-साथ सुंदर भजन एवं रामचरितमानस की चौपाइयां महाराज जी के श्री मुख से सुन कर श्रोता मंत्र मुग्ध हो गए।

प्रथम दिवस कथा समाचार

प्रथम दिवस कथा समाचार
रविवार चेन्नई,हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति के तत्वाधान में श्री रामदेव भवन में श्री मद भागवत कथा का शुभारंभ पंडित किशोरचन्द्र शास्त्री जी महाराज के श्री मुख से हुआ। कथा के कुछ अंश । 
कथा की सार्थकता जब ही सिध्द होती है जब इसे हम अपने जीवन में व्यवहार में धारण कर निरंतर हरि  स्मरण करते हुए अपने जीवन को आनंदमय, मंगलमय बनाकर अपना आत्म कल्याण करें। अन्यथा यह कथा केवल ' मनोरंजन ', कानों के रस तक ही सीमित रह जाएगी । भागवत कथा से मन का शुद्धिकरण होता है। इससे संशय दूर होता है और शांति व मुक्ति मिलती है। इसलिए सद्गुरु की पहचान कर उनका अनुकरण एवं निरंतर हरि  स्मरण,भागवत कथा श्रवण करने की जरूरत है। श्रीमद भागवत कथा श्रवण से जन्म जन्मांतर के विकार नष्ट होकर प्राणी मात्र का लौकिक व आध्यात्मिक विकास होता है। जहां अन्य युगों में धर्म लाभ एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए कड़े प्रयास करने पड़ते हैं, कलियुग में कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। सोया हुआ ज्ञान वैराग्य कथा श्रवण से जाग्रत हो जाता है। कथा कल्पवृक्ष के समान है, जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है।  सत्संग व कथा के माध्यम से मनुष्य भगवान की शरण में पहुंचता है, वरना वह इस संसार में आकर मोहमाया के चक्कर में पड़ जाता है, इसीलिए मनुष्य को समय निकालकर श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। ब'चों को संस्कारवान बनाकर सत्संग कथा के लिए प्रेरित करें।  कलियुग में भागवत साक्षात श्रीहरि का रूप है। पावन हृदय से इसका स्मरण मात्र करने पर करोड़ों पुण्यों का फल प्राप्त हो जाता है।इस कथा को सुनने के लिए देवी देवता भी तरसते हैं और दुर्लभ मानव प्राणी को ही इस कथा का श्रवण लाभ प्राप्त होता है।श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण मात्र से ही प्राणी मात्र का कल्याण संभव है। भगवान का नाम है सतचितआनन्द । श्री मदभागवत श्री हरि का वाङ्ग्मय स्वरूप है । हरि नाम संसार सागर पार करने की नोका है।भागवत जीवन को दिव्य बनाती है।घर में तुलसी जी होनी चाहिए और द्वार पर गैया होनी चाहिए।

   प्रातः काल शोभायात्रा राधा कृष्ण मंदिर से रामदेव भवन तक हुई। व्यास पूजन पंडित दामोदर प्रसाद विकास  गौड़ जी ने किया। कथा श्रवण करने के लिए सैंकड़ों श्रोता पधारे।  कथा के साथ-साथ सुंदर भजन एवं रामचरितमानस की चौपाइयां महाराज जी के श्री मुख से सुन कर श्रोता मंत्र मुग्ध हो गए। यह जानकारी हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति ने दी।

निमंत्रण पत्रिका


परिचय

हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति की स्थापना सन 2016  ई. में भारतवर्ष के तमिलनाडु प्रदेश की राजधानी चेन्नई  में समाज सेवा, देश एवं आध्यात्म की उन्नति के उद्देश्य से की गई।

भारतवर्ष आदिकाल से ही संतों-गुरूओं का देश रहा है। 
हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति समाज के गरीब, उपेक्षित एवं पिछड़े हुये लोगों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक उत्थान,गौसेवा एंव गौरक्षा के कार्य में अपने सीमित संसाधनों के साथ लगी हुई है। समाज के सभी वर्गों के लोगों से यह आह्वान किया जाता है कि सभी लोग इस संस्था से जुड़कर आत्मकल्याण एवं परोपकार के रास्ते पर चलते हुये अपना एवं जगत का कल्याण करें।

हिन्दू धर्म में भगवान के विभिन्न अवतार एवं स्वरूप की चर्चा की गई है। भगवान के विभिन्न स्वरूपों का दर्शन हम लोग अभी मूर्ति एवं फोटो के माध्यम से करते हैं। कुछ मनुष्य अपनी सेवा भावना, त्याग तपस्या एवं साधना के रास्ते भगवान के विभिन्न स्वरूपों का दर्शन करके अपने जीवन को धन्य बनाते हैं एवं जगत कल्याण के काम में लग जाते हैं। आम आदमी को भगवान के विभिन्न स्वरूपों का साक्षात्कार नहीं हो पात है। भगवान समय-समय पर अलग-अलग कालखण्ड में अपने प्रतिरूप को आम आदमी के बीच में भेजते हैं। जो आम आदमी की तरह संसार में जन्म लेते हैं एवं सांसारिक नियमों का पालन करते हुए गृहस्थ आश्रम त्याग कर संत हो जाते हैं। संत से भगवान प्यार करते हैं। हम आम आदमी संत के रूप में भगवान का दर्शन करके अपना जीवन धन्य करते हैं। संत का दर्शन, पूजन एवं सत्संग आम आदमी को हमेशा सुलभ रहता है।

संत के दर्शन, पूजन एवं सत्संग से प्राणियों के दुखों का अन्त होता है एवं सुखों की प्राप्ति होती है, पाप का नाश होता है, कुविचार सुविचार में बदल जाते हैं। उसके बाद प्राणी सुख, शांति एवं समृद्धि से परिपूर्ण होकर परोपकार के रास्ते पर चलते हुये अपना एवं जगत के कल्याण के काम में लग जाता है।

संतों ने सत्य को सर्वोपरि माना है और है भी। सत्य की संगति को सभी संतों, ज्ञानियों, मुनियों एवं गुरूओं ने एक सुर से सराहा है। इसी सत्संग को मानव कल्याण, सुख, समृद्धि एवं शांति का द्वार मानते हुए हमने इसे माध्यम बनाया है।