Wednesday, 17 August 2016

पंचम दिवस की कथा

पंचम दिवस की कथा
रामदेव भवन साहुकारपेट प्रांगण में चल रही सप्त दिवसीय भागवत कथा के पांचवें दिन कथा व्यास पं किशोरचंद्र शास्त्री जी महाराज ने श्रीराम जन्मोत्सव मनाया। उत्‍तरी भारत में सरयू नदी के तट पर बसी अयोध्‍या,जहॉं त्रेता युग में दशरथ के पुत्र राम का जन्‍म हुआ था। अयोध्‍या, अर्थात् जहॉं कभी युद्ध नहीं होता। एक दिन विश्‍वामित्र आए और अपने आश्रम के संरक्षण हेतु दो राजकुमार - राम और लक्ष्‍मण - मॉंगे। विश्‍वामित्र और दशरथ के गुरू वसिष्‍ठ का पुराना मनमुटाव प्रसिद्ध है। कहते हैं, विश्‍वामित्र क्षत्रिय कुल में उत्‍पन्‍न हुए थे और वसिष्‍ठ उन्‍हें ‘राजर्षि’ कहते थे। विश्‍वामित्र की इच्‍छा ‘ब्रम्‍हर्षि’ कहाने की थी। अंत में विश्‍वामित्र क्रोध पर विजय प्राप्‍त कर सचमुच में ब्रम्‍हर्षि बने। पर जब विश्‍वामित्र ने इन बालकों की जोड़ी को अपने आश्रम की रक्षा के लिए मॉंगा तो वसिष्‍ठ ने सहर्ष आज्ञा दिलवा दी। मानवता का और समाज का कार्य राम के द्वारा संपन्‍न होना था।अहिल्या उधार, सीता स्वयंवर,वनवास,खेवट का प्रसंग,सूर्पनखा के नाक कान काटना आदि प्रसंग विस्तार से बताये।
महाराज का कहना है कि श्रीराम कथा कलयुग में कामधेनु के समान है। कलिकाल में राम नाम स्मरण एवं भागवत कथा श्रवण मात्र से ही जीव कष्टों से छुटकारा पा सकता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस के रूप में अमृत प्रदान किया है। आज के विसंगतिपूर्ण वातावरण में अगर श्रीराम के आर्दश को अपना लिया जाए तो मानस का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। शास्त्री कहते हैं कि मानस में रामकथा में मर्यादा है। उन्होंने कहा कि विश्वास से कथा उतारने से कथा जीवन का सुधार कर देती है। श्रीराम कथा जीव के जन्म-जन्मांतर की व्यथा हर लेती है। रामकथा सुनने से जीव का संशय समाप्त हो जाता है और दुख दूर हो जाते हैं।उन्होंने कहा कि श्रीराम के चरित्र को सुनने मात्र से मन शांत हो जाता है और आनन्द मिलता है। व्यक्ति के तीनों तापों और छहों विकारों से उत्पन्न दुखों का रामनाम नाश कर देता है। जिन्होंने रामकथा नहीं सुनी उनके कान साँप के बिल के समान हैं और यदि व्यक्ति में रामभक्ति नहीं आई तो ऐसे लोगों की छाती बज्र के समान है, जिन्होंने राम-नाम-जप को अपनी जीभ में नहीं उतारा ऐसे लोगों की जीभ मेंढक और चमगादड़ के समान है। व्यास जी ने राम कथा के प्रसंग सुनाते हुए वर्तमान जीवन से जोड़ने का प्रयास किया |
आज श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की बड़ी ही मनोरम कथा का बखान किया गया। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में सराबोर श्रृद्धालु जन्मोत्सव पर जमकर नाचे और उपहारों की वर्षा की। श्रीमद् भागवत कथा सुनाते हुये शास्त्री ने कहा कि द्वापर युग में एक कंस के अत्याचार से समूची पृथ्वी थर्रा उठी थी। कंस का वध कर समाज को अत्याचार से मुक्त कराने और राष्ट्र को संपन्न बनाने के निमित्त से भगवान ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया था। किंतु आज समाज में फैले भ्रष्टाचार, अराजकता, दहेज, हिंसा रूपी कंस मुंह बाये खड़ा है। जिन्होंने पूरे देश को अपने चपेट में ले रखा है। इन तमाम कंसों से निपटने के लिए अब एक कृष्ण से काम नहीं चलने वाला है। आवश्यकता है कि हर घर में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण अवतरित हों। उनके नैतिक मूल्यों की स्थापना की, ताकि शान्ति के पथ पर चलकर जगतगुरू के पद पर फिर से हमारा राष्ट्र आसीन हो जायेगा। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण व मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जन्म सच्चे अर्थों में मानवता की स्थापना के लिए हुआ था। प्रसंग सुन श्रोता मंत्रमुग्ध होकर झूम उठे। भगवान को सिर पर टोकरी में लेकर जब भक्त प्रवचन स्थल में पहुंचे तो पूरा पंडाल जय कन्हैयालाल की आवाज से वृन्दावन में तब्दील हो गया। कथा में श्रीकृष्ण जन्म का प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने कहा की भगवान कभी जन्म नहीं लेते, अवतार धारण करते हैं, प्रगट होते हैं। प्रगट वही होता है जो पहले से विद्यमान हो और भगवान तो कण-कण में मौजूद रहते हैं। इसलिए उनका जनम नहीं होता। आगे उन्होंने कहा कि वासुदेव देवकी ने अपनी सात संतानों को अपनी आखों के सम्मुख काल के गाल में जाते देखा था और कंस का अहंकार रूपी घड़ा पूरा भर चुका था। इसलिए भगवान को जेल में प्रगट होना पड़ा। पुष्पों की होली खेलते हुए भक्तों द्वारा जन्म उत्सव मनाया गया। प्रसंग से पहले उन्होंने देवकी-वासुदेव प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया
  राम जन्म प्रसंग के साथ श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग सुनाएं।
यह जानकारी हरे रामा हरे कृष्णा सत्संग समिति के कार्यकर्ता मेवादास वैष्णव एंव मिठुदास वैष्णव ने दी।

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